छोटी छोरियों के शिकारी – New Sex Story

वह मुश्किल से 11 साल की थी। सुबह के साढ़े पाँच बजे थे, सड़क सुनसान थी। वह सलवार-कुर्ती में थी, और सड़क के किनारे हरी घास की ढेरी लगा रही थी। हमलोग पाँच थे, तीन पुरुष और दो युवा लड़कियां। हमारा काम रोजबरोज कमसिन व छोटी छोरियों की जांच -पड़ताल व उनका अपहरण करना था। हम दो मर्द आगे बढ़े और देखते-देखते उसे दबोच लिया। हममें से एक ने उसका मुंह दबोचा, दूसरे ने टांगें पकड़ उसे उठा लिया। वह छटपटा रही थी पर मुंह से आवाज नहीं निकली। गाड़ी थी हमारे पास, उसमें उसे धकेला और अपने मुकाम पर ले आए। हमारे सरगने की बॉस कोटाबाई पोटाटकर सामने थी। हमने इस छोटी छोरी को उसके सामने जमीन पर पटक दिया। छोटी छोरी ने उठने की कोशिश की तो मैंने उसे लात मारी जिससे वह लुढ़क कर ठीक कोटाबाई पोटाटकर के चरणकमलों के पास आ पड़ी। ध्यान से देखा तो यह छोरी छोटी होते हुए भी बड़ी सेक्सी थी, यहाँ तक की सलवार-कुर्ती भी उसकी मज़ेदार थी।

यह गुप्त अड्डा शहर से 47 किलोमीटर दूर एक सुनसान फार्म हाउस में था जहां छोटी-छोटी छोरियों के ताज़ा शिकारी उनका बलात्कार ( RAPE ) करने या घिनौना मज़ा लेने के लिए इकट्ठे होते थे। आज सेठ धरमचंद शाह और उनके दो मुस्टंडे साथी इसी पवित्र काम के लिए यहाँ तैयार खड़े थे। सेठ धरमचंद 58 वर्ष के थे व बाकी के दो लोग 50 और 52 के। माल उम्दा था इसलिए सबके मुंह में पानी आ गया; पानी नहीं सेक्स की मीठी चाशनी।

कोटाबाई पोटाटकर का दस्तूर यह था कि ऐसे घिनौने कुकर्म को देखने के लिए वे जवान छोकरियों व तंदुरुस्त मर्दों की टोली रखती थी। आज सेठ धरमचंद की सेवा में छह युवतियाँ ( 17 से 22 वर्ष ) लंगर लगाए खड़ी थीं।

इस 11 वर्ष की छोरी का नाम देवकी था। उसका चेहरा बहुत प्यारा और बदन तंदुरुस्त पर सेक्सी था। इस समय वह सिसक रही थी। मैंने अपने एक पैर का पंजा उसके मुंह पर दबा रखा था। एक ने उसे उसकी टांगें चौड़ी कर पीछे खींचा। सेठ धरमचंद उसके नाजुक व कमजोर अंगों का मुआयना करने आगे बढ़े। मैंने तब उस छोटी छोरी के मुंह पर रखा पैर का पंजा हटा लिया। वह फफककर रोने व गिड़गिड़ाने लगी। उसकी आँखों से आँसू फूट रहे थे व गालों पर बह निकले। चेहरे पर डर का साया ठहरा हुआ था। जरा ढील मिलते ही वो हाथ-पैर पटकने लगी। तभी सेठ धरमचंद की सेक्स-सेवा में लगी युवतियों में से एक ने जो पुलिस की वर्दी में थी उसे एक चांटा मारा जिससे उसकी घिग्घी बंध गई।

सेठ धरमचंद आगे बढ़े और वे उसके पास बैठ गए। उन्होंने जीभ निकाली व अपने ओठों पर फिराई। उनकी आँखें चमक रही थी, व तहमद में उनका मोटा ताज़ा ”लं ड” भभक कर खड़ा हो गया। सेठ ने पहले बच्ची की सपाट छाती टटोली। फिर कुर्ती ऊंची की। देवकी का गोरा पेट व गहरी नाभि देख उनको तसल्ली हुई। एक सहायक युवती ने बच्ची की कुर्ती को फुर्ती से निकाल फेंक दिया। वह अब अर्ध-नग्न थी। सेठ भी कमर से ऊपर अर्ध नग्न था।

सेठ खा-पीकर बहुत मोटाताजा था। उसका मोटा पेट आगे बढ़ा हुआ था और वजन 85 किलो था। बहुत सधे हुए तरीके से उसने अपना पेट छोटी छोरी के पेट से चिपकाया और उसकी सपाट छातियाँ बुरी तरह मसलने लगा। छोरी दर्द के मारे बिलबिलाने लगी। सेठ अपने मुंह से बच्ची की कच्ची छातियों का मांस अपने मुंह में भर-भर रहा था। उसका थूक निकल रहा था। वह छोरी के कोमल पेट से ठस-ठसाठस चिपटा हुआ था, और अब दांतों से उसकी छातियों के नर्म मांस को कुतर रहा था। छोरी हाँफ रही थी। उसे पीड़ा हो रही थी। उसकी गरमागरम साँसे तेज हो गईं।

सेठ धरमचंद उसके पेट पर से उतरा और कन्या की सलवार उतारने लपका। सलवार का नाड़ा खोल उसे नंगी कर डाला। सबने देखा, मैंने भी देखा कि छोरी की चूत बहुत छोटी-सी, मुलायम-कोमल, गोरी-गोरी, व पान के पत्ते जैसी थी। अब सेठ भी पूरा मादरजात नंगा हो गया। उसका लौड़ा बहुत मोटा, कठोर और विकराल था; अंडकोश भारी-भारी; घनी झांटें थीं। इस वक्त वह छोकरी किसी तरह सेठ के चंगुल से निकलने के लिए उठ कर दौड़ी। तभी पुलिस की वर्दी में लगी सेठ की सेक्स -सहायिका ने उसे पकड़ कर जमीन पर पटका और उसकी नाजुक गांड पर तड़ातड़ डंडे बरसाए। वह रोने और बिलखने लगी। मगर इससे सेठ या उसके दो दोस्त मर्दों को दया नहीं आई। उनके दो दोस्त मर्द गोंडामल ( 50 वर्ष ) और घीसालाल ( 52 वर्ष ) भी उसके साथ बलात्कार करने की बारी में नंगे हो खड़े थे। सेठ धर्मदास गरमा गया और उसने इस मासूम बालिका के पेट पर मुक्का मारा और उसके चेहरे व गालों पर झापड़। दोनों दोस्त भी कुत्सित तरीके से बाली उम्र की इस छोरी के नाजुक अंगों में अंगुल करने व नाखून चुभोने लगे। वह दहाड़ मार कर रो रही थी। वह चिल्ला रही थी, ” धरम के लिए छोड़ दो सेठ जी, मैं आपके बेटे-पोतों की भी बिटिया जैसी मासूम हूँ”। लेकिन इसका उन पापियों पर कोई असर नहीं पड़ा। बल्कि सेठ धर्मदास को गुस्सा आया और वो भक से छोटी छोरी की गांड का मांस काटने को दाँत गड़ाए और उस मासूम को नोंच लिया।

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यह दृश्य देखने वाली 6 युवतियों की मंडली ने तालियाँ बजाई। दूसरे मर्द भी हुंकार भर रहे थे।

सेठ धरमचंद शाह जी का नियम था की अगर छोकरी कमसिन है तो वे बलात्कार-पूर्वक सबसे पहले उसकी गांड मारते थे। लौड़ा गरम, दृढ़, और पुष्ट हो इसके लिए जरूरी था कि वह अपना लौड़ा बच्ची के मुंह में ठूंस कर उसे मजबूर करे कि वो सेठ का लंड चूँसे। सो सेठ जी ने छोटी छोरी के मुंह में कठोरता-पूर्वक अपना लौड़ा घुसेड़ा, और हाय वह बालिका भी डर के मारे सेठ का मोटा-मस्त लंड चूँसने लगी। दो मर्द, वही 50 और 52 वर्ष के– वे भी इस वक्त अपना लौड़ा बालिका के फूले-फले गालों पर रगड़ने लगे। दोनों ने बच्ची के कंठ दबोच रखे थे ताकि साली चूँ-चपड़ न करे। पुलिस वाली सेक्स-सहायिका ने बालिका का हाथ इन दो मर्दों के लौड़ों पर टिका कर इशारा किया कि वो छोरी अपनी मर्जी से उन्हें सहलाये।

जब सेठ धरमचंद का लौड़ा विकराल व मूसल जैसा हो गया तब तीनों पापी मर्दों ने छोरी की गांड का छेद चौड़ा करने के लिए अपनी-अपनी अंगुलियाँ उसमें धँसाई। आह, बड़ा घिनौना दृश्य था, बच्ची को दर्द हुआ मगर हमें मज़ा आ रहा था। सेठ धरमचंद बालिका की गांड के छेद में जीभ फँसाने लगे जिससे छोटा-सा छेद कुछ चौड़ा हो खुल गया था। अपनी गांड मरवाते हुए छोरी छींख-पुकार ना करे इसलिए बाकी कई लोगों ने उसके हाथ-पाँव पकड़-जकड़ रखे थे। एक मर्द बच्ची के नंगे-गोरे पेट पर ताल ठोक रहा था। छओं सेक्स-सहायक युवतियाँ भी मज़े ले रही थी। जबकि छोटी छोरी आहें भर-भर सिसक रही थी।

अब सेठ धरमचंद से रहा नहीं गया, उन्होने सच में अपना विक्रांत-क्रूर लौड़ा बालिका की नन्ही गांड के छेद में पेलना शुरू किया। उनका नागराज जैसा लौड़ा कठोर गति से आगे घुसुड़-फुसुड़ गति से सरकना शुरू हुआ। इस वक्त दो सेक्स-सहायक युवतियाँ सेठ के लंड़ की जड़ को सहला रही थी व दो उनकी गांड़ के गोलकों को। सेठ सांड की तरह हुंकार भर-भर कर बच्ची की गांड मार रहा था। उधर छोरी की आँखों से झर-झर आँसू टपक रहे। सेठ ने उस असहाय बालिका की गांड को पौन घंटे तक बीभत्स ढंग से रगड़ा। जैसे ही वो फारिग हुआ गोंडामल ( 50 वर्ष ) और घीसालाल ( 52 वर्ष ) लड़की की गांड मारने को आगे बढ़े।

सेठ धरमचंद अब बालिका की फुद्दी तरोडने-मरोड़ने को चालू हुआ। फुद्दी बहुत ही नन्ही व तंग थी। उसमें तो अंगुल भी नहीं फंस रही थी। सेठ ने उसकी कोमल चूत पर ठक-ठक हथेली ठरकाई, व वो उसकी चूत का बाजा बजाने लगा। चूत में शहद डाल उसे चूँसा, फिर एक छोटी-सी लाल-लाल रंग की मोमबत्ती फंसाई। फिर अंगुल-क्रिया करी। इससे बालिका की नन्ही चूत की कली-कली खुल गई। सेठ का लंड 8 इंच लंबा था। बालिका की टांगें व जांघें भरपूर चौड़ी पड़ी थी। पीछे से दो मर्द बारी-बारी उसकी गांड मार रहे थे व आगे सेठ का मूसल-लंड घुसा हुआ था। रह-रह कर वो सिसक रही थी, सुबक रही थी और बक रही थी कि उसे छोड़ दो, वह मर जाएगी। लेकिन उसके दर्द व बिलबिलाहट से सेठ का लंड़ और ताज़ा व मजबूत हो गया। अब तो मैंने भी आगे बढ़ इस छोरी केमुंह में अपना नंगा लौड़ा ठरका दिया। छोरी की जीभ बहुत गरम थी; मज़ा आ गया।

सेठ धरमचंद तो रेल के इंजन की तरह धक-धक धक्कापेल कर इस 11 वर्ष की कमसिन कबूतरी को रगड़े जा रहा था। कुल चार मर्द इस वक्त इस छोरी पर सवार थे। और तीन तमाशबीन मर्द उसके पेट और अन-उभरी सपाट छातियों को नोंच रहे थे। बालिका पसीने से लथपथ थी और सेठ के लंड़ की चोट पर चोट से उसकी योनि से खून भी बह रहा था। मगर कहीं दया नहीं थी। मैं सोचने लगा अभी तो गोंडामल और घीसालाल भी इसकी चूत पर चढ़ेंगे और मैं भी इसकी गांड़ मारूँगा तो ये कैसे सहन करेगी? अब सच्चाई ये है कि इस पापी बलात्कार के दौरान वह तीन बार बेहोश तक हुई पर हमने उसे छोड़ा नहीं; हाँ, डाक्टरी- उपचार जरूर किया ताकि हम मज़ा मार सकें।

बलात्कार क्रिया करने के बाद हम उसे वहीं छोड़ आए जहां से उसे उठा लाए थे।

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